Narayaneeyam-8-SA



 

श्रीमन्नारायणीयम् – 8 ( अष्टमम् दशकम् )

 


 

   

अथ श्रीमन्नारायणीयम् अष्टमम् दशकम्

प्रलय वर्णनं

जगत्सष्टिप्रकार वर्णनं च


   Verse
   

 

8-1   

एवं तावत् प्राकृतप्रक्षयान्ते

ब्राह्मे कल्पे ह्यादिमे लब्धजन्मा

ब्रह्मा भूयस्त्वत्त एवाप्य वेदान्

सृष्टिं चक्रे पूर्वकल्पोपमानाम्


8-1   Verse
   
8-1   Meaning
   

 

8-2   

सोऽयं चतुर्युगसहस्रमितान्यहानि

तावन्मिताश्च रजनीर्बहुशो निनाय

निद्रात्यसौ त्वयि निलीय समं स्वसृष्टै-

र्नैमित्तिकप्रलयमाहुरतोऽस्य रात्रिम्


8-2   Verse
   
8-2   Meaning
   

 

8-3   

अस्मादृशां पुनरहर्मुखकृत्यतुल्यां

सृष्टिं करोत्यनुदिनं स भवत्प्रसादात्

प्राग्ब्राह्मकल्पजनुषां च परायुषां तु

सुप्तप्रबोधनसमास्ति तदाऽपि सृष्टि:


8-3   Verse
   
8-3   Meaning
   

 

8-4   

पञ्चाशदब्दमधुना स्ववयोर्धरूप-

मेकं परार्धमतिवृत्य हि वर्ततेऽसौ

तत्रान्त्यरात्रिजनितान् कथयामि भूमन्

पश्चाद्दिनावतरणे च भवद्विलासान्


8-4   Verse
   
8-4   Meaning
   

 

8-5   

दिनावसानेऽथ सरोजयोनि:

सुषुप्तिकामस्त्वयि सन्निलिल्ये

जगन्ति च त्वज्जठरं समीयु-

स्तदेदमेकार्णवमास विश्वम्


8-5   Verse
   
8-5   Meaning
   

 

8-6   

तवैव वेषे फणिराजि शेषे

जलैकशेषे भुवने स्म शेषे

आनन्दसान्द्रानुभवस्वरूप:

स्वयोगनिद्रापरिमुद्रितात्मा


8-6   Verse
   
8-6   Meaning
   

 

8-7   

कालाख्यशक्तिं प्रलयावसाने

प्रबोधयेत्यादिशता किलादौ

त्वया प्रसुप्तं परिसुप्तशक्ति-

व्रजेन तत्राखिलजीवधाम्ना


8-7   Verse
   
8-7   Meaning
   

 

8-8   

चतुर्युगाणां च सहस्रमेवं

त्वयि प्रसुप्ते पुनरद्वितीये

कालाख्यशक्ति: प्रथमप्रबुद्धा

प्राबोधयत्त्वां किल विश्वनाथ


8-8   Verse
   
8-8   Meaning
   

 

8-9   

विबुध्य च त्वं जलगर्भशायिन्

विलोक्य लोकानखिलान् प्रलीनान्

तेष्वेव सूक्ष्मात्मतया निजान्त: –

स्थितेषु विश्वेषु ददाथ दृष्टिम्


8-9   Verse
   
8-9   Meaning
   

 

8-10   

ततस्त्वदीयादयि नाभिरन्ध्रा-

दुदञ्चितं किंचन दिव्यपद्मम्

निलीननिश्शेषपदार्थमाला-

संक्षेपरूपं मुकुलायमानम्


8-10   Verse
   
8-10   Meaning
   

 

8-11   

तदेतदंभोरुहकुड्मलं ते

कलेवरात् तोयपथे प्ररूढम्

बहिर्निरीतं परित: स्फुरद्भि:

स्वधामभिर्ध्वान्तमलं न्यकृन्तत्


8-11   Verse
   
8-11   Meaning
   

 

8-12   

संफुल्लपत्रे नितरां विचित्रे

तस्मिन् भवद्वीर्यधृते सरोजे

स पद्मजन्मा विधिराविरासीत्

स्वयंप्रबुद्धाखिलवेदराशि:


8-12   Verse
   
8-12   Meaning
   

 

8-13   

अस्मिन् परात्मन् ननु पाद्मकल्पे

त्वमित्थमुत्थापितपद्मयोनि:

अनन्तभूमा मम रोगराशिं

निरुन्धि वातालयवास विष्णो


8-13   Verse
   
8-13   Meaning
   

 

   

ॐ तत्सत् इति श्रीमन्नारायणीये अष्टमम् दशकम् समाप्तम्

श्री हरये नमः रमा रमण गोविन्द गोविन्दा

सर्वम् श्री कृष्णार्पणमस्तु


   Verse
   

 

   Verses 8-1 to 8-13
   

 

   Meaning 8-1 to 8-13
   

 


 

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