Narayaneeyam-18-SA



 

श्रीमन्नारायणीयम् – 18 ( अष्टादशम् दशकम् )

 


 

   

ॐ श्रीकृष्णाय परब्रह्मणे नम:

अथ श्रीमन्नारायणीयम् अष्टादशम् दशकम्

पृथुचरित वर्णनं


   Verse
   

 

18-1   

जातस्य ध्रुवकुल एव तुङ्गकीर्ते-

रङ्गस्य व्यजनि सुत: स वेननामा

यद्दोषव्यथितमति: स राजवर्य-

स्त्वत्पादे निहितमना वनं गतोऽभूत्


18-1   Verse
   

 

18-2   

पापोऽपि क्षितितलपालनाय वेन:

पौराद्यैरुपनिहित: कठोरवीर्य:

सर्वेभ्यो निजबलमेव सम्प्रशंसन्

भूचक्रे तव यजनान्ययं न्यरौत्सीत्


18-2   Verse
   

 

18-3   

सम्प्राप्ते हितकथनाय तापसौघे

मत्तोऽन्यो भुवनपतिर्न कश्चनेति

त्वन्निन्दावचनपरो मुनीश्वरैस्तै:

शापाग्नौ शलभदशामनायि वेन:


18-3   Verse
   

 

18-4   

तन्नाशात् खलजनभीरुकैर्मुनीन्द्रै-

स्तन्मात्रा चिरपरिरक्षिते तदङ्गे

त्यक्ताघे परिमथितादथोरुदण्डा-

द्दोर्दण्डे परिमथिते त्वमाविरासी:


18-4   Verse
   

 

18-5   

विख्यात: पृथुरिति तापसोपदिष्टै:

सूताद्यै: परिणुतभाविभूरिवीर्य:

वेनार्त्या कबलितसम्पदं धरित्री-

माक्रान्तां निजधनुषा समामकार्षी:


18-5   Verse
   

 

18-6   

भूयस्तां निजकुलमुख्यवत्सयुक्त्यै-

र्देवाद्यै: समुचितचारुभाजनेषु

अन्नादीन्यभिलषितानि यानि तानि

स्वच्छन्दं सुरभितनूमदूदुहस्त्वम्


18-6   Verse
   

 

18-7   

आत्मानं यजति मखैस्त्वयि त्रिधाम-

न्नारब्धे शततमवाजिमेधयागे

स्पर्धालु: शतमख एत्य नीचवेषो

हृत्वाऽश्वं तव तनयात् पराजितोऽभूत्


18-7   Verse
   

 

18-8   

देवेन्द्रं मुहुरिति वाजिनं हरन्तं

वह्नौ तं मुनिवरमण्डले जुहूषौ

रुन्धाने कमलभवे क्रतो: समाप्तौ

साक्षात्त्वं मधुरिपुमैक्षथा: स्वयं स्वम्


18-8   Verse
   

 

18-9   

तद्दत्तं वरमुपलभ्य भक्तिमेकां

गङ्गान्ते विहितपद: कदापि देव

सत्रस्थं मुनिनिवहं हितानि शंस-

न्नैक्षिष्ठा: सनकमुखान् मुनीन् पुरस्तात्


18-9   Verse
   

 

18-10   

विज्ञानं सनकमुखोदितं दधान:

स्वात्मानं स्वयमगमो वनान्तसेवी

तत्तादृक्पृथुवपुरीश सत्वरं मे

रोगौघं प्रशमय वातगेहवासिन्


18-10   Verse
   

 

   

अथ श्रीमन्नारायणीये अष्टादशम् दशकम् समाप्तम्

श्री हरये नमः रमा रमण गोविन्द गोविन्दा

श्री कृष्णार्पणमस्तु


   Verse
   

 

   Verses 18-1 to 18-10
   

 


 

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