Narayaneeyam-3-SA



 

श्रीमन्नारायणीयम् – 3 ( तृतीयम् दशकम् )

 


 

   

ॐ श्रीकृष्णाय परब्रह्मणे नम:

अथ श्रीमन्नारायणीयम् तृतीयम् दशकम्

भक्त स्वरूप वर्णनं

भक्ति प्रार्थना च


   Verse
   

 

3-1   

पठन्तो नामानि प्रमदभरसिन्धौ निपतिता:

स्मरन्तो रूपं ते वरद कथयन्तो गुणकथा: ।

चरन्तो ये भक्तास्त्वयि खलु रमन्ते परममू-

नहं धन्यान् मन्ये समधिगतसर्वाभिलषितान् ॥


3-1   Verse
   
3-1   Meaning
   

 

3-2   

गदक्लिष्टं कष्टं तव चरणसेवारसभरेऽ-

प्यनासक्तं चित्तं भवति बत विष्णो कुरु दयाम् ।

भवत्पादाम्भोजस्मरणरसिको नामनिवहा-

नहं गायं गायं कुहचन विवत्स्यामि विजने ॥


3-2   Verse
   
3-2   Meaning
   

 

3-3   

कृपा ते जाता चेत्किमिव न हि लभ्यं तनुभृतां

मदीयक्लेशौघप्रशमनदशा नाम कियती ।

न के के लोकेऽस्मिन्ननिशमयि शोकाभिरहिता

भवद्भक्ता मुक्ता: सुखगतिमसक्ता विदधते ॥


3-3   Verse
   
3-3   Meaning
   

 

3-4   

मुनिप्रौढा रूढा जगति खलु गूढात्मगतयो

भवत्पादाम्भोजस्मरणविरुजो नारदमुखा: ।

चरन्तीश स्वैरं सततपरिनिर्भातपरचि –

त्सदानन्दाद्वैतप्रसरपरिमग्ना: किमपरम् ॥


3-4   Verse
   
3-4   Meaning
   

 

3-5   

भवद्भक्ति: स्फीता भवतु मम सैव प्रशमये-

दशेषक्लेशौघं न खलु हृदि सन्देहकणिका ।

न चेद्व्यासस्योक्तिस्तव च वचनं नैगमवचो

भवेन्मिथ्या रथ्यापुरुषवचनप्रायमखिलम् ॥


3-5   Verse
   
3-5   Meaning
   

 

3-6   

भवद्भक्तिस्तावत् प्रमुखमधुरा त्वत् गुणरसात्

किमप्यारूढा चेदखिलपरितापप्रशमनी ।

पुनश्चान्ते स्वान्ते विमलपरिबोधोदयमिल-

न्महानन्दाद्वैतं दिशति किमत: प्रार्थ्यमपरम् ॥


3-6   Verse
   
3-6   Meaning
   

 

3-7   

विधूय क्लेशान्मे कुरु चरणयुग्मं धृतरसं

भवत्क्षेत्रप्राप्तौ करमपि च ते पूजनविधौ ।

भवन्मूर्त्यालोके नयनमथ ते पादतुलसी-

परिघ्राणे घ्राणं श्रवणमपि ते चारुचरिते ॥


3-7   Verse
   
3-7   Meaning
   

 

3-8   

प्रभूताधिव्याधिप्रसभचलिते मामकहृदि

त्वदीयं तद्रूपं परमसुखचिद्रूपमुदियात् ।

उदञ्चद्रोमाञ्चो गलितबहुहर्षाश्रुनिवहो

यथा विस्मर्यासं दुरुपशमपीडापरिभवान् ॥


3-8   Verse
   
3-8   Meaning
   

 

3-9   

मरुद्गेहाधीश त्वयि खलु पराञ्चोऽपि सुखिनो

भवत्स्नेही सोऽहं सुबहु परितप्ये च किमिदम् ।

अकीर्तिस्ते मा भूद्वरद गदभारं प्रशमयन्

भवत् भक्तोत्तंसं झटिति कुरु मां कंसदमन ॥


3-9   Verse
   
3-9   Meaning
   

 

3-10   

किमुक्तैर्भूयोभिस्तव हि करुणा यावदुदिया-

दहं तावद्देव प्रहितविविधार्तप्रलपितः ।

पुरः क्लृप्ते पादे वरद तव नेष्यामि दिवसा-

न्यथाशक्ति व्यक्तं नतिनुतिनिषेवा विरचयन् ॥


3-10   Verse
   
3-10   Meaning
   

 

   

ॐ तत्सत् इति श्रीमन्नारायणीये तृतीयम् दशकम् समाप्तम्

श्री हरये नमः रमा रमण गोविन्द गोविन्दा

श्री कृष्णार्पणमस्तु


   Verse
   

 

   Verses 3-1 to 3-10
   

 

   Meaning 3-1 to 3-10
   

 


 

Please leave your valuable suggestions and feedback here