Narayaneeyam-4-SA



 

श्रीमन्नारायणीयम् – 4 ( चतुर्थम् दशकम् )

 

   चतुर्थम् दशकम् -प्रस्तावना
   

 

   

ॐ श्रीकृष्णाय परब्रह्मणे नम:

अथ श्रीमन्नारायणीयम् चतुर्थम् दशकम्

अष्टाङ्ग योग वर्णनं

योग सिद्धि वर्णनं च


   Verse
   

 

4-1   

कल्यतां मम कुरुष्व तावतीं कल्यते भवदुपासनं यया ।

स्पष्टमष्टविधयोगचर्यया पुष्टयाशु तव तुष्टिमाप्नुयाम् ॥


4-1   Verse
   
4-1   Meaning
   

 

4-2   

ब्रह्मचर्यदृढतादिभिर्यमैराप्लवादिनियमैश्च पाविता: ।

कुर्महे दृढममी सुखासनं पङ्कजाद्यमपि वा भवत्परा: ॥


4-2   Verse
   
4-2   Meaning
   

 

4-3   

तारमन्तरनुचिन्त्य सन्ततं प्राणवायुमभियम्य निर्मला: ।

इन्द्रियाणि विषयादथापहृत्यास्महे भवदुपासनोन्मुखा: ॥


4-3   Verse
   
4-3   Meaning
   

 

4-4   

अस्फुटे वपुषि ते प्रयत्नतो धारयेम धिषणां मुहुर्मुहु: ।

तेन भक्तिरसमन्तरार्द्रतामुद्वहेम भवदङ्घ्रिचिन्तका ॥


4-4   Verse
   
4-4   Meaning
   

 

4-5   

विस्फुटावयवभेदसुन्दरं त्वद्वपु: सुचिरशीलनावशात् ।

अश्रमं मनसि चिन्तयामहे ध्यानयोगनिरतास्त्वदाश्रयाः ॥


4-5   Verse
   
4-5   Meaning
   

 

4-6   

ध्यायतां सकलमूर्तिमीदृशीमुन्मिषन्मधुरताहृतात्मनाम् ।

सान्द्रमोदरसरूपमान्तरं ब्रह्म रूपमयि तेऽवभासते ॥


4-6   Verse
   
4-6   Meaning
   

 

4-7   

तत्समास्वदनरूपिणीं स्थितिं त्वत्समाधिमयि विश्वनायक ।

आश्रिता: पुनरत: परिच्युतावारभेमहि च धारणादिकम् ॥


4-7   Verse
   
4-7   Meaning
   

 

4-8   

इत्थमभ्यसननिर्भरोल्लसत्त्वत्परात्मसुखकल्पितोत्सवा: ।

मुक्तभक्तकुलमौलितां गता: सञ्चरेम शुकनारदादिवत् ॥


4-8   Verse
   
4-8   Meaning
   

 

4-9   

त्वत्समाधिविजये तु य: पुनर्मङ्क्षु मोक्षरसिक: क्रमेण वा ।

योगवश्यमनिलं षडाश्रयैरुन्नयत्यज सुषुम्नया शनै: ॥


4-9   Verse
   
4-9   Meaning
   

 

4-10   

लिङ्गदेहमपि सन्त्यजन्नथो लीयते त्वयि परे निराग्रह: ।

ऊर्ध्वलोककुतुकी तु मूर्धत: सार्धमेव करणैर्निरीयते ॥


4-10   Verse
   
4-10   Meaning
   

 

4-11   

अग्निवासरवलर्क्षपक्षगैरुत्तरायणजुषा च दैवतै: ।

प्रापितो रविपदं भवत्परो मोदवान् ध्रुवपदान्तमीयते ॥


4-11   Verse
   
4-11   Meaning
   

 

4-12   

आस्थितोऽथ महरालये यदा शेषवक्त्रदहनोष्मणार्द्यते ।

ईयते भवदुपाश्रयस्तदा वेधस: पदमत: पुरैव वा ॥


4-12   Verse
   
4-12   Meaning
   

 

4-13   

तत्र वा तव पदेऽथवा वसन् प्राकृतप्रलय एति मुक्तताम् ।

स्वेच्छया खलु पुरा विमुच्यते संविभिद्य जगदण्डमोजसा ॥


4-13   Verse
   
4-13   Meaning
   

 

4-14   

तस्य च क्षितिपयोमहोऽनिलद्योमहत्प्रकृतिसप्तकावृती: ।

तत्तदात्मकतया विशन् सुखी याति ते पदमनावृतं विभो ॥


4-14   Verse
   
4-14   Meaning
   

 

4-15   

अर्चिरादिगतिमीदृशीं व्रजन् विच्युतिं न भजते जगत्पते ।

सच्चिदात्मक भवत् गुणोदयानुच्चरन्तमनिलेश पाहि माम् ॥


4-15   Verse
   
4-15   Meaning
   

 

   

ॐ तत्सत् इति श्रीमन्नारायणीये चतुर्थम् दशकम् समाप्तम्

श्री हरये नमः रमा रमण गोविन्द गोविन्दा

श्री कृष्णार्पणमस्तु


   Verse
   

 

   Verses 4-1 to 4-15
   

 

   Meaning 4-1 to 4-15
   

 


 

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